Sunday, June 19, 2011

सुनामी....अब ये नीला उफान लाल हो गया.......


सकुन चैन की जिन्दगी थी सबकी.
किलकारिया,हंसी थी अबकी.
अचानक मुसीबतों का धमाल हो गया.
अब ये नीला उफान लाल हो गया.......
कई मासूमो का जिन्दगी का काल हो गया,

रोजी रोटी जिनका था सहारा.
वो जगह था समुन्द्र का किनारा.
बेकारी,भुखमरी का वहा जाल हो गया.
अब ये नीला उफान लाल हो गया.......
कई मासूमो का जिन्दगी का काल हो गया,

सैलानियों के सैर का संसार था.
पर्यटन का अनोखा भंडार था.
उनके लिए अब ये बुरा साल हो गया.
अब ये नीला उफान लाल हो गया.......
कई मासूमो का जिन्दगी का काल हो गया,

दाना और दवाई के लिए,
पानी और कमाई के लिए.
युवतियों का सस्ता खाल हो गया. 
अब ये नीला उफान लाल हो गया.......
कई मासूमो का जिन्दगी का काल हो गया.

कुनामी ये सुनामी,ढाया ऐसा कहर.
जहा थी अमृत की छाया, पड़ा वहा जहर.
समुन्द्र का हिला स्तर, तो मौत का चाल हो गया.
अब ये नीला उफान लाल हो गया.......
कई मासूमो का जिन्दगी का काल हो गया.

हरिस कहे, हाथ जोड़ के हरि से,
बिछड़ो को मिला फिर से.
फिर जिंदगी में ऐसी कमाल हो जाये.
और बूढ़ा, बच्चा फिर से निहाल हो जाये.
अब इस नीले उफान का हलाल हो जाये.

 हरिकेश कुमार यादव

ये ट्रेन हमारे लिए क्या क्या ना करे.

चाहे हो गर्मी, चाहे हो सर्दी,
बरसात की बूंद भी परे.
ये ट्रेन हमारे लिए क्या क्या ना करे.

चाहे हो दिन चाहे हो रात,चाहे हो सुबह चाहे हो शाम,
फिर भी ना साँस धरे,
ये ट्रेन हमारे लिए क्या क्या ना करे.

चाहे हो नदिया, चाहे हो पहाड़, चाहे हो रेगिस्तान चाहे हो कंकरीला स्थान,
जंगल में भी ये ना डरे.
ये ट्रेन हमारे लिए क्या क्या ना करे.

Saturday, May 21, 2011

एक शायर को शायरी मिल गयी

एक शायर को शायरी मिल गयी


दर्दे दिल की डायरी मिल गयी

जो हम न कर सके वो मेरे नौशाद कर गए'

मेरे जख्मो पर मरहम भर गए!

"हरिकेश"

परम प्यार में बेवफाई ना करना.


तुम्हे देख कर मै जीता रहा हूँ,
जिंदगी के सारे गम पीता रहा हूँ
उज्जाले में अँधेरे कि परछाई ना करना,
परम प्यार में बेवफाई ना करना.


तेरी ख़ुशी के लिए अपना गम छुपाता रहा हूँ.
जिंदगी के लम्हों को यू ही बिताता रहा हूँ .
समुंदर में रेत कि दुहाई ना करना ,
परम प्यार में बेवफाई ना करना.


तुम्हारे सपनों को हकीकत बनता रहा हूँ ,
कोई रहे ना कसर ये दिखता रहा हूँ.
धरती से चाँद कि फरमाईस ना करना,
परम प्यार में बेवफाई ना करना .

"हरिकेश"

Tuesday, April 12, 2011

अन्ना हजारे, भारत संवारे...

अन्ना हजारे, भारत संवारे,

कभी थे तुम्हारे,अब हो गए हमारे.

भ्रष्टाचार को अब, लगाये किनारे.

बन गए अब, सबके प्यारे.

अन्ना हजारे,भारत संवारे,

नदियों के पानी भी, लगाने लगे थे खारे,

मीठा बनायेंगे, अब मिल करके सारे

अन्ना हजारे, भारत संवारे.

स्वच्छ छवि अब, बनायेंगे सारे.

दिन में भी, हरिकेश अब दिखायेंगे तारे.

अन्ना हजारे, भारत संवारे

Friday, March 18, 2011

होली हरिकेश कि........................

नीले पीले लाल गुलाल, सुंदर परिवेश कि
हँस गाकर सब खुशिया मनाइये,
होली देखिये हरिकेश कि..................

आना जाना लगा रहेगा, देश और विदेश कि.
यहाँ भी मनाइये वहा भी मनाइये .
लेकिन होली देखिये हरिकेश कि............

सदा जीवन उच्चा विचार, नारा है स्वदेश कि.
तिलक लगा कर इस बार होली  मनाइये.
फिर होली देखिये हरिकेश कि..............

गुलाल कि होली अबकी होगी,रंग हो गया परदेश कि.
जल कि बचत कल कि होगी.
फिर होली देखिये हरिकेश कि........

18-03-11



Thursday, March 17, 2011

स्कूल का शनीच्चर पूजा

 सुबह जैसे ही आँख खुलती थी हम जल्दी जल्दी  फूल लेने के लिए फूलो के पौधों के पास भाग कर जाते थे कि कही कोई और ना हमसे ज्यादा फूल तोड़ ले,और अपने किताब पर ज्यादा ना सजावट कर ले. हम लाल रंग के लिए आडौल जिसे  गुडहल कहते है लाते थे.पीले रंग के लिए कनइल(कनैल),सफ़ेद के लिए लक्षमणबूटी,और कई फूल लाते थे, बड़ी इत्मिनान से उसे पानी से धुल कर पालीथीन में रख लेते थे.फिर होता था हमारे दातुन करने और स्नान करने का काम. ये सब करने के बाद हम धुले हुए कपडे पहन कर तैयार हो जाते थे.उसके बाद याद आती थी गुरु जी के लिए शानिच्चरा, फिर हाथ में फूल कंधे पर प्लास्टिक के बोरी का सिला झोला जिसमे बस्ता होता था, लेकर माँ के साथ बाबूजी के पास जाते थे. माँ कहती थी कि "बाबु पढ़े जात बा आज शनिचर ह १० पइसा दे दी शनिचरा खातिर ना त गुरु जी भगा देब " हम माँ के आँचल में छुप कर देखते रहते थे कि बाबूजी क्या कहते है. फिर बाबूजी मेरे  हाव भाव को देख कर बोलते थे कि बिना पइसा के पूजा नहीं होता है क्या? ये हर शनिचर का फालतू का झंझट है. फिर किसी तरह  १० पैसा मिलता था. जैसे ही बाबूजी का हाथ पाकेट में जाता था, मन ख़ुशी से झूम उठता था.१० पैसे हमारे हाथ में आते ही हम तो १०० कि स्पीड में भागते थे स्कूल  कि ओर.हमारे साथी भी हमारा इंतजार करते थे.उनके यहाँ भी शायद हमरे जैसे ही कहानी दुहरानी पड़ती थी.    .बड़ी ख़ुशी होती थी कि हप्ते में एक दिन शनिवार आता था, और उस दिन हम कई रंग के फूल तोड़ कर लाते थे .मुझे अभी भी याद है, जब हम गाँव के स्कूल में पढ़ने जाते थे.कोई भी ऐसा  शनीच्चर यानि की शनिवार नहीं होता था जिसमे की हम बिना घर से पैसा लिए स्कूल जाये.अगर घर से पैसे नहीं मिलते थे तो हम स्कूल नहीं जाते थे. उसका बस एक ही कारण होता था कि गुरु जी आज शानिच्चरा पूजने नहीं देंगे.

Dhanyabad
Harikesh Kumar Yadav