सुबह जैसे ही आँख खुलती थी हम जल्दी जल्दी फूल लेने के लिए फूलो के पौधों के पास भाग कर जाते थे कि कही कोई और ना हमसे ज्यादा फूल तोड़ ले,और अपने किताब पर ज्यादा ना सजावट कर ले. हम लाल रंग के लिए आडौल जिसे गुडहल कहते है लाते थे.पीले रंग के लिए कनइल(कनैल),सफ़ेद के लिए लक्षमणबूटी,और कई फूल लाते थे, बड़ी इत्मिनान से उसे पानी से धुल कर पालीथीन में रख लेते थे.फिर होता था हमारे दातुन करने और स्नान करने का काम. ये सब करने के बाद हम धुले हुए कपडे पहन कर तैयार हो जाते थे.उसके बाद याद आती थी गुरु जी के लिए शानिच्चरा, फिर हाथ में फूल कंधे पर प्लास्टिक के बोरी का सिला झोला जिसमे बस्ता होता था, लेकर माँ के साथ बाबूजी के पास जाते थे. माँ कहती थी कि "बाबु पढ़े जात बा आज शनिचर ह १० पइसा दे दी शनिचरा खातिर ना त गुरु जी भगा देब " हम माँ के आँचल में छुप कर देखते रहते थे कि बाबूजी क्या कहते है. फिर बाबूजी मेरे हाव भाव को देख कर बोलते थे कि बिना पइसा के पूजा नहीं होता है क्या? ये हर शनिचर का फालतू का झंझट है. फिर किसी तरह १० पैसा मिलता था. जैसे ही बाबूजी का हाथ पाकेट में जाता था, मन ख़ुशी से झूम उठता था.१० पैसे हमारे हाथ में आते ही हम तो १०० कि स्पीड में भागते थे स्कूल कि ओर.हमारे साथी भी हमारा इंतजार करते थे.उनके यहाँ भी शायद हमरे जैसे ही कहानी दुहरानी पड़ती थी. .बड़ी ख़ुशी होती थी कि हप्ते में एक दिन शनिवार आता था, और उस दिन हम कई रंग के फूल तोड़ कर लाते थे .मुझे अभी भी याद है, जब हम गाँव के स्कूल में पढ़ने जाते थे.कोई भी ऐसा शनीच्चर यानि की शनिवार नहीं होता था जिसमे की हम बिना घर से पैसा लिए स्कूल जाये.अगर घर से पैसे नहीं मिलते थे तो हम स्कूल नहीं जाते थे. उसका बस एक ही कारण होता था कि गुरु जी आज शानिच्चरा पूजने नहीं देंगे.
Dhanyabad
Harikesh Kumar Yadav
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