Sunday, January 1, 2012

नए साल 2012

नए साल की बहुत बहुत बधाई. ये नया साल २०१२ सबके जीवन में एक नयी उमंग एक नयी तरंग एक नयी दिशा ले के आये. आज बहुत दिनों के बाद मै अपनी ब्लॉग लिख रहा हूँ.
मेरे पास आज कल समय की कमी है, इसलिए मै कुछ लिख नहीं पा रहा हूँ. वैसे तो लिखने को बहुत कुछ पड़ा है जो मै लिखना चाहता हूँ .


Harikesh
01012012-08.05pm

Thursday, October 20, 2011

मेरा भी कुछ लिखने को जी करता है.

मेरा भी कुछ लिखने को जी करता है.
किसी की कहानी,
किसी की जुबानी,
किसी की कविता,
तो किसी का वर्णन.
जब लिखने बैठता हूँ  तो शब्द खो जाते है.. और कभी अचानक ही एसे शब्द निकल जाते है, मै खुद ही अपना लिखा हुआ पढ़ कर कहता हूँ. क़ि क्या गजब लिखा है. पता नहीं ये कहा से सिखा है.
बहुत  ही  सुन्दर  सुन्दर  विचार  मेरे  मन में  आते  है.और जब भी लिखने जाऊ  तो पता नहीं कहा खो जाते है..
 हर  दम  पेन  और  डायरी  पास  नहीं  होती  है .. मेरी  कल्पनाये  बस  यू ही  खोती है...मेरा  लिखा  कोई  न पढ़े  , इसका  मुझे  मलाल  नहीं. जब  कोई  पढ़  ले  तो  उसके  पास  फिर  कोई  सवाल  नहीं..



Monday, August 29, 2011

अंग्रेजों की कोठियां खंडहरों में बदल रही.. दोमाठ

कुशीनगर। अंग्रेज साहबों की शान से भरी जीवनशैली की गवाह उनकी कोठियां खंडहरों में बदल रही हैं। देश को आजादी मिलने से पूर्व यह क्षेत्र नील की खेती के लिए मशहूर था। यहां से उत्पादित नील लंदन जाता था। 1910 में जर्मनी ने जब नील का विकल्प तलाश लिया तो अंग्रेजों ने इसकी खेती बंद कर दी। जिले में जहां नील की खेती होती थी, वहां उन्होंने खुद के रहने के लिए आलीशान कोठियों का निर्माण कराया। बाद में इन स्थानों के फार्म हाउसों में नील की खेती को छोड़कर 1914 में सेवरही चीनी मिल का निर्माण हुआ।


सत्रहवीं शताब्दी में कुशीनगर जिले के बभनौली, सपहां, दोमाठ व बैकुण्ठपुर में अंग्रेजों ने नील की खेती शुरू करायी थी। इन स्थानों पर अंग्रेजों के रहने के लिए कोठियों का निर्माण कराया गया था। उन्होंने सभी किसानों को कम से कम तीन कट्ठा खेत में नील की खेती करना अनिवार्य कर दिया था। जो किसान खेती करने के लिए तैयार नहीं होते, उनको मजदूर बना लिया जाता। 1910 में जब जर्मनी ने नील का विकल्प खोजा तो अंग्रेज भी नील की खेती से मुंह मोड़ने लगे। तब उन्होंने अपने फार्म हाउसों में नील की खेती को छोड़कर सेवरही में चीनी मिल की स्थापना की। बभनौली कोठी में रहने वाले अंग्रेज अफसर वहां से रोज सेवरही आते थे। बभनौली कोठी चौराहे पर आज भी नील का जर्जर हौदा मौजूद है, जिस पर स्थानीय लोगों ने कब्जा जमा लिया है।

देश को आजादी मिलने के बाद अंग्रेज ब्रिटेन लौट गये उनकी कोठियों व चीनी मिल पर सरकार का आधिपत्य हो गया। बावजूद इसके, इनके संरक्षण का कोई इंतजाम न होने से अब ये खंडहर में तब्दील हो रही हैं। बभनौली के एक कब्रिस्तान में कुछ अंग्रेजों की कब्रें हैं, जिन पर सबसे पुरानी तिथि वर्ष 1776 की तथा अंतिम तिथि वर्ष 1956 की अंकित है।

Saturday, July 23, 2011

रुक्मिणी कुण्डिनपुर (विदर्भ)

महाभारत में विदर्भ देश के राजा भीम का उल्लेख है जिसकी राजधानी कुण्डिनपुर में थी। इसकी पुत्री दमयंती निषध नरेश की महारानी थी [1]

कालांतर में नल दमयंती की दो संतानें हुईं। पुत्र का नाम इन्द्रसेन था तथा पुत्री का इन्द्रसेनीं। कलि ने सुअवसर देखकर नल के शरीर में प्रवेश किया तथा दूसरा रूप धारण करके वह पुष्कर के पास गया। पुष्कर नल का भाई लगता थां उसे कलि ने उकसाया कि वह जुए में नल को हराकर समस्त राज्य प्राप्त कर ले। पुष्कर नल के महल में उससे जुआ खेलने लगा। नल ने अपना समस्त वैभव, राज्य इत्यादि जुए पर लगाकर हार दिया। दमयंती ने अपने सारथी को बुलाकर दोनों बच्चों को अपने भाई-बंधुओं के पास कुण्डिनपुर (विदर्भ देश में) भेज दिया।


उन दिनों विदर्भ देश में भीष्मक नामक एक परम तेजस्वी और सद्गुणी नृपति राज्य करते थे। कुण्डिनपुर उनकी राजधानी थी। उनके पांच पुत्र और एक पुत्री थी। उसके शरीर में लक्ष्मी के शरीर के समान ही लक्षण थे। अतः लोग उसे लक्ष्मीस्वरूपा कहा करते थे।


भगवान श्रीकृष्ण के गुणों और उनकी सुंदरता पर मुग्ध होकर रुक्मिणि ने मन ही मन निश्चय किया कि वह श्रीकृष्ण को छोड़कर किसी को भी पति रूप में वरण नहीं करेगी। उधर, भगवान श्रीकृष्ण को भी इस बात का पता हो चुका था कि विदर्भ नरेश भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी परम रूपवती तो है ही, परम सुलक्षणा भी है।

Wednesday, June 22, 2011

जी करता है कि, कह दू कि प्यार है.


जिस दिन से तुम्हे देखा, मेरे पे ये जूनून सवार है.
लेकिन मुझे डर लगता है, शायद मेरे आगे कोई दिवार है.
जी करता है कि, कह दू कि प्यार है.
पता नहीं तेरा हाँ है या तेरा इंकार है.

रोज पेड़ के पास खड़ा होना.लगता है किसी का इंतजार है.
कही वो मै तो नहीं, या शायद मेरा कोई यार है.
जी करता है कि, कह दू कि प्यार है.
पता नहीं तेरा हाँ है या तेरा इंकार है.

बस एक बार पलट कर मुस्करा तो दो,मै समझूंगा कि ये तेरा इज़हार है.
वर्ना मै तड़प तड़प के मर जाऊंगा, और समझूंगा कि ये मेरा दिल बीमार है.
जी करता है कि, कह दू कि प्यार है.
पता नहीं तेरा हाँ है या तेरा इंकार है.


मै तुम्हारे इतना सुन्दर तो नहीं,फिर भी ये दिल वफादार है.
खुदा कि कसम कही भी आजमा लो,हर मुश्किल में हम तैयार है.
जी करता है कि, कह दू कि प्यार है.

पता नहीं तेरा हाँ है या तेरा इंकार है.

बस एक बार मेरा नाम तो पूछ लो,समझूंगा जिंदगी में आई बहार है.
हरिस कि धड़कने बढ़ जाएगी, और बजने लगी गिटार है.
जी करता है कि, कह दू कि प्यार है.
पता नहीं तेरा हाँ है या तेरा इंकार है.
हरिकेश कुमार यादव

हे देवराज, महाराज..


आई डी यू में  जब से आपका  आगाज है.
क्लास में नहीं है जो आने वाले,उनको आप पर ही नाज है.
हे देवराज, महाराज आप का राज ही राज है..

बिना पढ़े  को पास करते, आप उनके महाराज है.
आप की असीम अनुकम्पा से,उनके सर पे ताज है.
हे देवराज, महाराज आप का राज ही राज है..

जो नहीं है बोलने वाले, उनके लिए सुर और साज है.
ववंडर की इस दुनिया में आप, कल और आज है.
हे देवराज, महाराज आप का राज ही राज है..


आपके शिष्य हरिकेश को, नहीं शर्म और लाज है.
आपके वजह से ही, हम कही पर गिराते गाज है.
हे देवराज, महाराज आप का राज ही राज है..


हरिकेश कुमार यादव
डेट-2005 collage  campush

Sunday, June 19, 2011

बड़ा ही महत्व है.................


कार्यालय में क्लर्क का,
व्यवसाय में संपर्क का.
लाइफ में वर्क का.
रेखाओ में कर्क का.
बड़ा ही महत्व  है.................

अवतारों में राम का.
विषय में परसुराम  का.
फलो में आम का.
नशे में जाम का.
बड़ा ही महत्व है.................


जंगल में जगदीश का.
पढाई में फ़ीस का.
बेयरिंग में ग्रीस का.
जानवरों में किस का.
बड़ा ही महत्व है.................


रिश्ते में यार का.
पलंग में प्यार का.
चाकू में धार का.
बिजली में तार का.
बड़ा ही महत्व है.................


कवि में बिहारी का.
कथा में तिवारी का .
सभा में दरबारी का.
भोजन में तरकारी.
बड़ा ही महत्व है.................


ज्ञान में लाला का.
मकान में ताला का.
पद में साला का.
गले में माला का.
बड़ा ही महत्व है.................


गाय में काली का.
बागीचे में माली का.
बर्तन में थाली.
कान में बाली का.
रिश्ते में साली का.
बड़ा ही महत्व है.................


रास्ते में कृति का.
शरीर में फुर्ती का.
मंदिर में मूर्ति का.
औरतो में कुर्ती का.
बड़ा ही महत्व है.................


रंग में लाल का.
घोड़े में नाल का.
युध में ढाल का.
नाव में पाल का.
बड़ा ही महत्व है.................


छाता में कमानी का.
उम्र में जवानी का.
संसार में दानी का.
रेगिस्तान में पानी का.
बड़ा ही महत्व है.........

जाड़ो में ऊन का.
शरीर में खून का.
संगीत में धुन का.
नाईट में मून का.
बड़ा ही महत्व है.........

हरिकेश कुमार यादव