Monday, November 12, 2012

दिवाली कि बहुत बहुत बधाई 13/11/2012.

दिवाली कि  बहुत बहुत बधाई 13/11/2012.

Sunday, May 13, 2012

जिंदगी एक रेल है।

जिंदगी एक खेल है,
ये चलती एक रेल है।.
रुक जाये तो फेल है।
नहीं तो ये जेल है।
खुशनुमा रहे तो मेल है।
चिकना हो जाये तो तेल है।. 

Monday, April 2, 2012

जिंदगी क्या है ? हरिकेश हरिस


जिंदगी क्या है ?
सोचो जरा.

हवा का एक झोका.
दिखता नहीं एहसास होता है.

पानी का एक बुलबुला.
उठता है पर मिलता नहीं.

आग की ज्वाला.
पकड़ में आता नहीं, मगर जला जाता है.

एक सोच.
जो हम सोच पाते नहीं.

एक विचार.
जो हम कर पाते नहीं.

एक समस्या.
जो हम सुलझा पाते नहीं.

एक ख़ुशी .
जो हम मना पाते नहीं.

एक गीत.
जो हम गा पाते नहीं.

जिंदगी क्या है..सोचो जरा... हरिकेश हरिस

Sunday, January 1, 2012

नए साल 2012

नए साल की बहुत बहुत बधाई. ये नया साल २०१२ सबके जीवन में एक नयी उमंग एक नयी तरंग एक नयी दिशा ले के आये. आज बहुत दिनों के बाद मै अपनी ब्लॉग लिख रहा हूँ.
मेरे पास आज कल समय की कमी है, इसलिए मै कुछ लिख नहीं पा रहा हूँ. वैसे तो लिखने को बहुत कुछ पड़ा है जो मै लिखना चाहता हूँ .


Harikesh
01012012-08.05pm

Thursday, October 20, 2011

मेरा भी कुछ लिखने को जी करता है.

मेरा भी कुछ लिखने को जी करता है.
किसी की कहानी,
किसी की जुबानी,
किसी की कविता,
तो किसी का वर्णन.
जब लिखने बैठता हूँ  तो शब्द खो जाते है.. और कभी अचानक ही एसे शब्द निकल जाते है, मै खुद ही अपना लिखा हुआ पढ़ कर कहता हूँ. क़ि क्या गजब लिखा है. पता नहीं ये कहा से सिखा है.
बहुत  ही  सुन्दर  सुन्दर  विचार  मेरे  मन में  आते  है.और जब भी लिखने जाऊ  तो पता नहीं कहा खो जाते है..
 हर  दम  पेन  और  डायरी  पास  नहीं  होती  है .. मेरी  कल्पनाये  बस  यू ही  खोती है...मेरा  लिखा  कोई  न पढ़े  , इसका  मुझे  मलाल  नहीं. जब  कोई  पढ़  ले  तो  उसके  पास  फिर  कोई  सवाल  नहीं..



Monday, August 29, 2011

अंग्रेजों की कोठियां खंडहरों में बदल रही.. दोमाठ

कुशीनगर। अंग्रेज साहबों की शान से भरी जीवनशैली की गवाह उनकी कोठियां खंडहरों में बदल रही हैं। देश को आजादी मिलने से पूर्व यह क्षेत्र नील की खेती के लिए मशहूर था। यहां से उत्पादित नील लंदन जाता था। 1910 में जर्मनी ने जब नील का विकल्प तलाश लिया तो अंग्रेजों ने इसकी खेती बंद कर दी। जिले में जहां नील की खेती होती थी, वहां उन्होंने खुद के रहने के लिए आलीशान कोठियों का निर्माण कराया। बाद में इन स्थानों के फार्म हाउसों में नील की खेती को छोड़कर 1914 में सेवरही चीनी मिल का निर्माण हुआ।


सत्रहवीं शताब्दी में कुशीनगर जिले के बभनौली, सपहां, दोमाठ व बैकुण्ठपुर में अंग्रेजों ने नील की खेती शुरू करायी थी। इन स्थानों पर अंग्रेजों के रहने के लिए कोठियों का निर्माण कराया गया था। उन्होंने सभी किसानों को कम से कम तीन कट्ठा खेत में नील की खेती करना अनिवार्य कर दिया था। जो किसान खेती करने के लिए तैयार नहीं होते, उनको मजदूर बना लिया जाता। 1910 में जब जर्मनी ने नील का विकल्प खोजा तो अंग्रेज भी नील की खेती से मुंह मोड़ने लगे। तब उन्होंने अपने फार्म हाउसों में नील की खेती को छोड़कर सेवरही में चीनी मिल की स्थापना की। बभनौली कोठी में रहने वाले अंग्रेज अफसर वहां से रोज सेवरही आते थे। बभनौली कोठी चौराहे पर आज भी नील का जर्जर हौदा मौजूद है, जिस पर स्थानीय लोगों ने कब्जा जमा लिया है।

देश को आजादी मिलने के बाद अंग्रेज ब्रिटेन लौट गये उनकी कोठियों व चीनी मिल पर सरकार का आधिपत्य हो गया। बावजूद इसके, इनके संरक्षण का कोई इंतजाम न होने से अब ये खंडहर में तब्दील हो रही हैं। बभनौली के एक कब्रिस्तान में कुछ अंग्रेजों की कब्रें हैं, जिन पर सबसे पुरानी तिथि वर्ष 1776 की तथा अंतिम तिथि वर्ष 1956 की अंकित है।