Friday, March 18, 2011

होली हरिकेश कि........................

नीले पीले लाल गुलाल, सुंदर परिवेश कि
हँस गाकर सब खुशिया मनाइये,
होली देखिये हरिकेश कि..................

आना जाना लगा रहेगा, देश और विदेश कि.
यहाँ भी मनाइये वहा भी मनाइये .
लेकिन होली देखिये हरिकेश कि............

सदा जीवन उच्चा विचार, नारा है स्वदेश कि.
तिलक लगा कर इस बार होली  मनाइये.
फिर होली देखिये हरिकेश कि..............

गुलाल कि होली अबकी होगी,रंग हो गया परदेश कि.
जल कि बचत कल कि होगी.
फिर होली देखिये हरिकेश कि........

18-03-11



Thursday, March 17, 2011

स्कूल का शनीच्चर पूजा

 सुबह जैसे ही आँख खुलती थी हम जल्दी जल्दी  फूल लेने के लिए फूलो के पौधों के पास भाग कर जाते थे कि कही कोई और ना हमसे ज्यादा फूल तोड़ ले,और अपने किताब पर ज्यादा ना सजावट कर ले. हम लाल रंग के लिए आडौल जिसे  गुडहल कहते है लाते थे.पीले रंग के लिए कनइल(कनैल),सफ़ेद के लिए लक्षमणबूटी,और कई फूल लाते थे, बड़ी इत्मिनान से उसे पानी से धुल कर पालीथीन में रख लेते थे.फिर होता था हमारे दातुन करने और स्नान करने का काम. ये सब करने के बाद हम धुले हुए कपडे पहन कर तैयार हो जाते थे.उसके बाद याद आती थी गुरु जी के लिए शानिच्चरा, फिर हाथ में फूल कंधे पर प्लास्टिक के बोरी का सिला झोला जिसमे बस्ता होता था, लेकर माँ के साथ बाबूजी के पास जाते थे. माँ कहती थी कि "बाबु पढ़े जात बा आज शनिचर ह १० पइसा दे दी शनिचरा खातिर ना त गुरु जी भगा देब " हम माँ के आँचल में छुप कर देखते रहते थे कि बाबूजी क्या कहते है. फिर बाबूजी मेरे  हाव भाव को देख कर बोलते थे कि बिना पइसा के पूजा नहीं होता है क्या? ये हर शनिचर का फालतू का झंझट है. फिर किसी तरह  १० पैसा मिलता था. जैसे ही बाबूजी का हाथ पाकेट में जाता था, मन ख़ुशी से झूम उठता था.१० पैसे हमारे हाथ में आते ही हम तो १०० कि स्पीड में भागते थे स्कूल  कि ओर.हमारे साथी भी हमारा इंतजार करते थे.उनके यहाँ भी शायद हमरे जैसे ही कहानी दुहरानी पड़ती थी.    .बड़ी ख़ुशी होती थी कि हप्ते में एक दिन शनिवार आता था, और उस दिन हम कई रंग के फूल तोड़ कर लाते थे .मुझे अभी भी याद है, जब हम गाँव के स्कूल में पढ़ने जाते थे.कोई भी ऐसा  शनीच्चर यानि की शनिवार नहीं होता था जिसमे की हम बिना घर से पैसा लिए स्कूल जाये.अगर घर से पैसे नहीं मिलते थे तो हम स्कूल नहीं जाते थे. उसका बस एक ही कारण होता था कि गुरु जी आज शानिच्चरा पूजने नहीं देंगे.

Dhanyabad
Harikesh Kumar Yadav