क्या सुनाऊ व्यथा मन की।
कथा जन जन की।।
भ्रष्टाचार अपने चरम पर है।
सारे लोग अपने धरम पर है।।
हर बात को राजनीति से जोड़ रहे है।
जननीति की कमर तोड़ रहे है।
आकर कोई तो संभाले इस बागडोर को
कथा जन जन की।।
भ्रष्टाचार अपने चरम पर है।
सारे लोग अपने धरम पर है।।
हर बात को राजनीति से जोड़ रहे है।
जननीति की कमर तोड़ रहे है।
आकर कोई तो संभाले इस बागडोर को