मेरा भी कुछ लिखने को जी करता है.
किसी की कहानी,
किसी की जुबानी,
किसी की कविता,
तो किसी का वर्णन.
किसी की जुबानी,
किसी की कविता,
तो किसी का वर्णन.
जब लिखने बैठता हूँ तो शब्द खो जाते है.. और कभी अचानक ही एसे शब्द निकल जाते है, मै खुद ही अपना लिखा हुआ पढ़ कर कहता हूँ. क़ि क्या गजब लिखा है. पता नहीं ये कहा से सिखा है.
बहुत ही सुन्दर सुन्दर विचार मेरे मन में आते है.और जब भी लिखने जाऊ तो पता नहीं कहा खो जाते है..
हर दम पेन और डायरी पास नहीं होती है .. मेरी कल्पनाये बस यू ही खोती है...मेरा लिखा कोई न पढ़े , इसका मुझे मलाल नहीं. जब कोई पढ़ ले तो उसके पास फिर कोई सवाल नहीं..